यी मठ पर
खाली वक्त में
झरने के पास बैठा
खेल रहा हूँ रोडियों से
आस पास खोजता हूँ जंगली फूल
सुनता हूँ चिडियों की चहचहाहट
चारों तरफ़ है
वासंती झरनों की गूँज
शुरुवाती वसंत
दिन कुनकुने होते जा रहे हैं
बर्फ पिघलती जा रही है
लगातार फैलता प्रकाश है धरती पर
बर्फ हो रही है गायब
एक ही चीज़ है जिसे वसंत बदल नहीं पाया
मेरी कनपटियों के पाले जैसी सफेदी वाले बाल ।
चीनी कवि पाई छु यी : चीनी कवि ; रचनाकाल (७७२ -- ८४६)
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त्रिनेत्र जी,
ReplyDeleteपूरी दुनिया जान गई लगती है कि हल्द्वानी में कवि का मकान लग रहा है. वहीं पास के गाँव गौलापार में हम भी हैं. आपका ईमेल मेरे पास नहीं है, इसलिए यहाँ मैसेज छोड़ रहा हूँ.
अपना फ़ोन नंबर भेज सकते हैं क्या इस ईमेल पर:
rajesh1joshi@gmail.com